सेंधवा: पोर्नोग्राफी पर रोक लगाने की मांग सुप्रीम कोर्ट में, 4 हफ्ते बाद होगी अगली सुनवाई
सेंधवा के अधिवक्ता बी.एल. जैन की सुप्रिम कोर्ट में दायक की याचिका

सेंधवा। व्यक्तियो के साथ-साथ समाज विशेष रूप से विकासशील मस्तिष्कों 13 से 18 वर्ष की आयु के युवाओ द्वारा पोर्न वीडियो देखने की आदत के कारण हमारे देश की संस्कृति नष्ट हो रही है। भारतीय बाजार में चाईल्ड पोर्नाेग्राफी सहित 20 करोड़ से अधिक वीडियो उपलब्ध है । इस पर अंकुश लगाये जाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका की सुनवाई पश्चात् चीफ जस्टिस बी आर गवई एवं जस्टिस के. विनोद चन्द्रन ने 4 सप्ताह बाद सुनवाई तिथी निर्धारित की है।
सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बी.एल.जैन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत जनहित याचिका की सुनवाई 3 नवम्बर को हुई जिसमें याचिकाकर्ता के अधिवक्ता वरूण ठाकुर ने अदालत को बताया कि दुनिया भर के अनेक देशों ने पोर्न साईट पर प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन हमारे देश में पोर्न वीडियो की साईटे भारतीय बाजार में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है आपने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता द्वारा विभिन्न स्त्रोतो से जो जानकारी एकत्रित की गई है वह चौकाने वाली है जिसके अनुसार सन् 2005 से हर सेकण्ड 5 हजार पोर्न साईटे देखी जा रही है प्रतिवर्ष इंटरनेट या पोर्न वीडियो के जरिये 20 करोड़ से अधिक वीडियो लान्च किये जाते है जिस पर अश्लील वीडियो/ अश्लील क्लिपींग जिसमें बाल पोर्नाेग्राफी भी शामिल है जो कि भारतीय बाजार में खुलेआम उपलब्ध है। कोर्ट को बताया गया कि कोविड महामारी के बाद डिजिटल पहुंच पर अधिक जोर दिया गया परिणाम स्वरूप बच्चे मोबाईल का उपयोग अधिक से अधिक कर रहे है क्योंकि बाल पोर्नाेग्राफी एक क्लिक में उपलब्ध होती है इस कारण बच्चे इसे अधिक देखने लगे है । बाल मन पर आ रही इस विकृती के कारण हमारी संस्कृति पथभ्रष्ट होती जा रही है यही नहीं उम्रदराज व्यक्ति भी इसके आदि बन चुके है परिणाम महिलाओं/युवतियो के खिलाफ होने वाले अधिकांश अपराध तथा बच्चों के साथ सामुहिक बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे जो अपराध हो रहे है निश्चित ही इसमें पोनोग्राफी वीडियो का बड़ा हिस्सा है इसी के परिणामस्वरूप रिश्तों के टुटने की संख्या जहां बढ़ रही है वहीं आत्म हत्याओं के मामले भी इन्हीं विकृतियों के कारण बढ़ रहे है जो सम्पुर्ण समाज के लिये गम्भीर चिंता का विषय बना हुआ है ऐसी स्थिति में इस पर अंकुश लगाया जाना अनिवार्य है।
याचिकाकर्ता की ओर से सर्वाेच्च अदालत को बताया गया कि पोर्न वीडियो साईट की विकृतियों के कारण ही यूरोप, आस्ट्रेलिया, चीन और अरब देशों ने इस पर पुर्णतः प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन संस्कारो की बात करने वाला भारत देश इस मामले में अभी भी पिछडा हुआ है इसलिये ’भारत सरकार को पोर्नाेग्राफी देखने पर अंकुश लगाने विशेष रूप से जो वयस्कता की आयु के समीप है उनके देखने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए इसके लिये एक राष्ट्रीय नीति तैयार करते हुवे एक कार्ययोजना का मसौदा बनाना चाहिये। याचिका में सुचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 69 का हवाला दिया गया है, जो केन्द्र सरकार को कम्प्युटर साधनो के माध्यम से साम्रगी तक सार्वजनिक पहुंच को अवरूद्ध करने का अधिकार देती है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि नाबालिगो को नुकसान पहुंचाने के दस्तावेज के बावजुद केन्द्र सरकार इन शक्तियों को प्रयोग करने में विफल रहा है। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में भारत सरकार के सचिव सुचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सचिव सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सचिव गृह मंत्रालय, सचिव दुरसंचार विभाग, इंटरनेट सेवा करदाता कम्पनी को प्रतिवादी बनाया है। अदालत ने सरकार की प्रतिक्रिया ओर आगे के विचार विमर्श के लिये समय देते हुवे 4 सप्ताह के बाद मामले की फिर से सुनवाई निर्धारित की है।



