आपकी बात; प्रभावशाली बलात्कारी को सजा दिलाना मुश्किल, जेल में रखना और ज्यादा मुश्किल

आपकी बात
प्रभावशाली बलात्कारी को सजा दिलाना मुश्किल, जेल में रखना और ज्यादा मुश्किल
रंजन श्रीवास्तव / भोपाल
ranjansrivastava1@gmail.com
दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा बलात्कारी कुलदीप सिंह सेंगर की सजा को, उसकी सजा के खिलाफ अपील पर फैसला होने तक, निलंबित किए जाने के आदेश ने देश में हर उस व्यक्ति को जो कानून के राज में यकीन रखता है, को झकझोर दिया है. इसलिए नहीं कि यह आदेश सही है या गलत, बल्कि इसलिए क्योंकि देश में जब ऐसे व्यक्ति सामने आते हैं जो प्रभावशाली हैं और किसी बालिका या महिला से बलात्कार करते हैं, उनको जेल के अंदर रखना कठिन होता जा रहा है. शायद जितनी मेहनत और संघर्ष उनको सजा दिलाने में होती है, उससे भी ज्यादा संघर्ष ऐसे बलात्कारियों को जेल के अंदर रखने में होता है और यह सब इसलिए होता है कि कई बार राज्य सरकारों की व्यवस्था उनके साथ खड़ी मिलती है या उनकी तरफ उदासीन रवैया अपना लेती है किसी खास कारण से. बलात्कारी राम रहीम और आसाराम का उदाहरण सबके सामने है. राम रहीम तो अक्सर पैरोल पर जेल के बाहर ही पाया जाता है और खासकर तब जब हरियाणा और पंजाब में चुनाव होने वाले हों. इस पर एक अलग बहस की जा सकती है कि क्या सरकारों और उनके सिस्टम की संवेदनाएं बलात्कार की पीड़ितों के प्रति हैं या पीड़ितों के बलात्कारियों के प्रति जो अपना एक अलग रसूख रखते हैं और समाज के एक तबके के वोटों पर उनका अधिकार मान लिया जाता है. पर फिलहाल वर्तमान मुद्दा तो कुलदीप सिंह सेंगर है जिसने सत्ता पक्ष का विधायक रहते हुए एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार किया और उसे चुप रहने की धमकी दी इस बात पर कि अगर वह चुप नहीं रही तो उसका अंजाम उसके साथ और उसके परिवार के साथ बहुत बुरा होगा. उसके प्रभाव का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पुलिस ने बलात्कार पीड़िता की प्राथमिक सूचना रिपोर्ट बलात्कार के 10 महीने बाद दर्ज की और वह भी तब जब पुलिस और सिस्टम से निराश बलात्कार पीड़िता ने 8 अप्रैल, 2018 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने आत्मदाह करने की कोशिश की. यह वही उत्तर प्रदेश है जहां मुख्यमंत्री बार-बार कानून व्यवस्था को चाक-चौबंद होने की बात करते हैं और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को रोकने के नाम पर उन्होंने दूसरी बार अपनी सरकार बनाई. बलात्कार की घटना 4 जून, 2017 को हुई थी जब एक महिला नौकरी दिलाने के नाम पर पीड़िता को कुलदीप सिंह सेंगर के आवास पर ले गई जहां सेंगर ने उसका बलात्कार किया. पीड़िता उस समय नाबालिग थी. पीड़िता धमकी के कारण बलात्कार के बाद चुप थी पर उसकी बुरी हालत देखते हुए जब उसकी एक रिश्तेदार ने उससे सहानुभूतिपूर्वक बात की तब उसने बलात्कार की घटना के बारे में बताया. उस रिश्तेदार ने पीड़िता की मां को इसकी जानकारी दी. पीड़िता को लेकर उसकी मां पुलिस थाने गई पर रिपोर्ट नहीं लिखी गई क्योंकि उस घटना के आरोपी सत्ता पक्ष के “माननीय” विधायक थे. जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो पीड़िता की मां ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अगस्त, 2017 में एक पत्र लिखा पर जब उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तो फिर पीड़िता ने मुख्यमंत्री आवास के बाहर आत्मदाह की कोशिश की. पर ऐसा नहीं कि इससे “माननीय” को गिरफ्तार कर लिया गया. उत्तर प्रदेश सरकार ने केस को CBI को अप्रैल 2018 में ट्रांसफर कर दिया. सेंगर की गिरफ्तारी पीड़िता के पिता की न्यायिक हिरासत के दौरान मौत के बाद हुई. उसके पिता को सेंगर के भाई और अन्य ने बुरी तरह मारा और उल्टा उसे ही आर्म्स एक्ट में फंसाकर पुलिस द्वारा जेल भिजवा दिया. मतलब सरकारी व्यवस्था अपना वीभत्स रूप बार-बार दिखाती रही और सेंगर की गिरफ्तारी पीड़िता के पिता की मौत के बाद तभी हुई जबकि केस को सीबीआई को ट्रांसफर किया गया. बाद में पीड़िता, उसके रिश्तेदार और वकील पर भी हमला किया गया जिसमें उसके रिश्तेदार की मौत हो गई और पीड़िता को अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां वेंटीलेटर पर रहने के बाद जान बची. हाई कोर्ट ने इस आधार पर सेंगर की सजा को निलंबित किया है कि पोक्सो (POCSO) एक्ट के अंतर्गत उसे जितनी सजा हो सकती थी वह उसने पूरी कर ली है क्योंकि वह कानून के अनुसार एक पब्लिक सर्वेंट नहीं माना जा सकता. उच्च न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने गलती से दोष सिद्ध को पब्लिक सर्वेंट मानकर एग्रीवेटेड ऑफेंस के लिए कड़ी सजा दी थी (उम्र कैद). असल में उसके खिलाफ पोक्सो एक्ट की दूसरी धारा में सजा देनी चाहिए थी. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है. सेंगर की सजा पर क्या फैसला होता है वह महत्वपूर्ण तो है ही उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि किसी विधायक को पब्लिक सर्वेंट माना जाए या नहीं इस पर भी सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला देगा. अगर किसी विधायक को पब्लिक सर्वेंट माना जाता है तो फिर सांसदों को भी पब्लिक सर्वेंट माना जाएगा. और फिर किसी विधायक या सांसद द्वारा इस तरह का कोई अपराध करने पर उन्हें कड़ी से कड़ी सजा का सामना करना पड़ेगा. दरअसल एआर अंतुले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ही कह चुका है कि एक विधायक को पब्लिक सर्वेंट नहीं माना जा सकता. इसी निर्णय को आधार बनाकर हाई कोर्ट ने सेंगर के मामले में उसकी सजा को निलंबित किया है



