भोपालमध्यप्रदेशमुख्य खबरे

आपकी बात; इंदौर की घटना सदोष मानव वध क्यों नहीं माना जाए?

आपकी बात
इंदौर की घटना सदोष मानव वध क्यों नहीं माना जाए?
रंजन श्रीवास्तव
ranjansrivastava1@gmail.com

अभी तक 17 मौतें हो चुकी हैं. कई लोग अभी भी अस्पतालों के आईसीयू में हैं. कारण घोर प्रशासनिक लापरवाही और असंवेदनशीलता है क्योंकि अगर समय रहते भागीरथपुरा के रहवासियों की समस्याओं को सुन लिया गया होता और उसका तत्काल समाधान कर दिया गया होता तो ये मौतें टाली जा सकती थीं. और सिर्फ प्रशासन ही क्यों? सवाल यह भी उठता है कि शासन क्या कर रहा था. क्या उसे जमीनी हकीकत बिल्कुल भी नहीं पता थी? यह क्या संभव है कि लोग महीनों से गंदे और बदबूदार पानी की सप्लाई की शिकायत कर रहे हों और शासन बेखबर बना रहे वह भी तब जबकि इंदौर के जिला प्रभारी मंत्री स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव हैं और नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय स्वयं इंदौर के निवासी हैं जो ज्यादातर समय इंदौर में बिताते हैं. विजयवर्गीय का स्वयं कहना है कि उन्हें गंदे पानी की शिकायत 15 दिन पहले मिली थी और उस शिकायत को उन्होंने कमिश्नर को प्रेषित कर दिया था. ज्ञातव्य है कि कैलाश विजयवर्गीय का विभाग ही नगरीय निकायों की अम्ब्रेला बॉडी है जो नगरीय निकायों के कार्य को मॉनिटर करती है. विजयवर्गीय यह तो मानते हैं कि सिस्टम की कमी के कारण यह घटना हुई है पर साथ में यह भी कहना नहीं भूलते कि वे इस घटना के लिए व्यक्तिगत तौर पर स्वयं जिम्मेदार नहीं हैं. इस ट्रेजेडी के दौरान इंदौर में हुई एक बैठक में, स्थानीय मीडिया के अनुसार, इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने यहां तक कहा कि उनकी बात को अफसर सुनते ही नहीं हैं. जहां तक नगर निगम का मामला है स्थानीय मीडिया के रिपोर्ट्स के अनुसार भागीरथपुरा में अगस्त में ही नई पाइपलाइन डालने का काम पूरा हो जाना था पर फाइल पर अफसर बैठे रहे. यानी किसी न किसी अफसर के स्तर पर घोर नहीं घनघोर लापरवाही की गई जिसका खामियाजा भागीरथपुरा के उन लोगों को भुगतना पड़ा जो शासन और प्रशासन की बाट जोहते जोहते गंदा पानी लगातार पीने को मजबूर थे. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की परिभाषा धारा 100 के अंतर्गत सदोष मानव वध की परिभाषा है कि जो कोई व्यक्ति किसी कार्य से मृत्यु कारित करता है, यदि वह कार्य निम्नलिखित में से किसी एक के साथ किया गया हो: 1. मृत्यु कारित करने के आशय से, या 2. ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से जो मृत्यु कारित करने के लिए संभाव्य हो, या 3. यह जानते हुए कि उस कार्य से मृत्यु होने की संभावना है, तो वह सदोष मानव वध का अपराध करता है. इस अपराध में मुख्य तत्व यह है कि मृत्यु किसी जीवित व्यक्ति की होनी चाहिए और कार्य और मानसिक स्थिति का संयोग आवश्यक है. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 101 BNS में बताया गया है कि सदोष मानव वध किन विशेष परिस्थितियों में हत्या कहलाता है जैसे बहुत उच्च स्तर का आशय या ज्ञान, या अपवाद न लागू होना. यदि धारा 101 की शर्तें पूरी नहीं होतीं या उसके अपवाद लागू होते हैं, तो यह हत्या की कोटि में न आने वाला सदोष मानव वध कहलाता है.
धारा 105 में हत्या न होने वाले सदोष मानव वध का दंड दिया गया है जैसे यदि अपराध मृत्यु या गंभीर क्षति के आशय से किया गया तो आजीवन कारावास, या 5 वर्ष से 10 वर्ष तक की कैद (किसी भी प्रकार की) और जुर्माना. पर यदि अपराध केवल ज्ञान के साथ किया गया यानी बिना आशय के पर मृत्यु की संभावना को जानते हुए तब उस स्थिति में 10 वर्ष तक की कैद (किसी भी प्रकार की) और जुर्माना. अब सवाल यह उठता है कि क्या इंदौर की भागीरथपुरा की घटना सदोष मानव वध मानी जा सकती है? और यदि हां, तो क्यों? घटना में प्रशासनिक लापरवाही स्पष्ट है. पुलिस चौकी के शौचालय का सीवेज पेयजल के पाइपलाइन में जा रहा था जिससे दूषित पानी सप्लाई हुआ जिसकी वजह से अभी तक 17 जानें जा चुकी हैं और बहुत से लोगों का अभी भी इलाज चल रहा है जिनमें कई गंभीर अवस्था में आईसीयू में हैं. यहां हत्या का आशय नहीं था, इसलिए धारा 302 (हत्या) लागू नहीं हो सकती पर यदि साबित होता है जिम्मेदार अधिकारियों/ठेकेदारों को इस बात की जानकारी थी कि उनकी लापरवाही से मृत्यु होने की संभावना है, और फिर भी उन्होंने वाटर पाइप को सुधारने या बदलने का कार्य नहीं किया तो यह सदोष मानव वध बन सकता है. पर यक्ष प्रश्न यही है कि सरकार इस मामले को कितनी गंभीरता से लेती है. क्या वह स्वयं इस घटना को सदोष मानव वध मानने को तैयार है और क्या इस घटना की न्यायिक जांच करवा कर वह इस बात को जानने की कोशिश करेगी कि किस अधिकारी की लापरवाही और किस स्तर पर थी. सरकार ने जिस तरह नगर निगम आयुक्त को इंदौर से हटाकर दो अधिकारियों को निलंबित करके इस मामले से आगे बढ़ने की कोशिश की है उससे लगता नहीं कि सरकार इस मामले को लेकर वाकई गंभीर है और उसकी कोशिश यह है कि दोषी अधिकारियों को सजा ऐसी हो कि वह एक मिसाल बने. पर सत्य यह भी है कि न्यायिक जांच होने की दशा में शासन के स्तर पर हुई लापरवाही भी सामने आ सकती है जो कि सरकार के लिए गले की हड्डी बन सकती है

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!