सेंधवा: इंदल उत्सव पर आदिवासी संगठनों का विरोध, राज्यपाल के नाम ज्ञापन, मटली में मंदिर-मूर्ति हटाने की मांग, उत्सव बंद करने की चेतावनी
मटली में आयोजित इंदल उत्सव को लेकर आदिवासी समाज ने परंपरा से छेड़छाड़ का आरोप लगाया

सेंधवा ; आदिवासी संगठनों ने परंपरागत इंदल उत्सव के स्वरूप में बदलाव का विरोध करते हुए प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। उत्सव बंद करने, मंदिर और मूर्ति हटाने की मांग के साथ आंदोलन की चेतावनी दी गई है।
सेंधवा शहर थाने पर रविवार को आदिवासी समाज के लोगों ने राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन एसडीओपी अजय वाघमारे को सौंपा। ज्ञापन में राजपुर तहसील के ग्राम मटली में आयोजित होने वाले इंदल उत्सव का विरोध करते हुए इसे तत्काल बंद करने और वहां स्थापित मंदिर एवं मूर्ति को हटाने की मांग की गई। आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह आयोजन उनकी पारंपरिक संस्कृति और मान्यताओं के विपरीत है।
इंदल उत्सव की पारंपरिक परिभाषा
भारत आदिवासी समन्वय मंच की कोर कमेटी सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता पोरलाल खरते ने बताया कि आदिवासी संस्कृति में इंदल कार्यक्रम प्रकृति, धान और पशु-पक्षियों की पूजा से जुड़ा होता है, जिसमें सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। यह उत्सव परंपरागत रूप से 5, 7, 9 या 12 वर्ष के अंतराल पर ही मनाया जाता है, न कि प्रतिवर्ष।
उत्सव के स्वरूप में बदलाव का विरोध
पोरलाल खरते के अनुसार, बीते लगभग दो दशकों से मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मटली में इस उत्सव को विकृत रूप में आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जहां आदिवासी परंपरा में कलम के पेड़ की टहनी की पूजा की जाती है, वहीं मटली में मंदिर बनाकर मूर्ति स्थापित कर दी गई है। आदिवासी संगठनों का आरोप है कि इससे उनकी परंपराओं, पहचान और इतिहास को बदले जाने का प्रयास किया जा रहा है।

आंदोलन की चेतावनी और कानूनी तर्क
आदिवासी समाज ने स्पष्ट किया कि सरकार का दायित्व शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क और किसानों को सिंचाई के साधन उपलब्ध कराना है, न कि किसी समुदाय की परंपरा या सभ्यता में हस्तक्षेप करना। संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि इंदल उत्सव बंद नहीं किया गया, तो 23 तारीख को विभिन्न क्षेत्रों से लोग रैली के रूप में मटली पहुंचकर इसे बंद करने का प्रयास करेंगे। ज्ञापन सौंपते समय आदिवासी एकता परिषद के मंडल सदस्य अनिल रावत, जनपद उपाध्यक्ष सीताराम बर्डे सहित बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग मौजूद रहे। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि धार्मिक और सांस्कृतिक हस्तक्षेप संविधान के अनुच्छेद 15(1) के विरुद्ध तथा अनुसूचित जाति जनजाति (अत्याचार निवारण अधिनियम) 1989 की धारा 3(1)(ज) के तहत दंडनीय अपराध है।




