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आपकी बात युवराज की मौत के बाद उसी को दोषी ठहराने की निर्लज्ज कोशिश

आपकी बात
युवराज की मौत के बाद उसी को दोषी ठहराने की निर्लज्ज कोशिश
रंजन श्रीवास्तव
ranjansrivastava1@gmail.com

“जय हिंद सर” यह वह आवाज़ है जो एक वीडियो क्लिप को देखते हुए सुनाई देती है, जिसे नोएडा में 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत पर सोशल मीडिया पर किसी ने वायरल कर दिया.
इस वीडियो क्लिप में युवराज एक पब में दिखाई देते हैं. इस वीडियो क्लिप द्वारा यह दर्शाने की कोशिश की गई कि युवराज अपनी मौत के पहले इसी पब में थे और शराब पीने के बाद नशे में कार चलाने की वजह से वह दुर्घटना का शिकार हुए.
ज्ञातव्य है कि युवराज की कार एक निर्माणाधीन मॉल के गड्ढे में गिर गई थी और वह पानी से भरा हुआ था. युवराज कार से बाहर निकलने में सफल भी रहे. अपने पिता को दुर्घटना के बारे में जानकारी देकर अपने को बचाने को लिए तुरंत कोई कदम उठाने को कहा.
अपने पुत्र की जान बचाने के लिए पिता ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया. पुलिस, फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंच भी गई. युवराज अपने मोबाइल फोन की टॉर्च जलाकर अपनी उपस्थिति दिखाने की कोशिश करते रहे.
जाहिर है, वह चिल्ला-चिल्लाकर मदद मांगते रहे, पर ठंड की उस रात में वर्दी पहने किसी भी जवान ने पानी तक में उतरने की हिम्मत नहीं दिखाई, जबकि इन सभी जवानों को आपातकालीन परिस्थिति में लोगों को कैसे बचाना है, इसकी बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है. धीरे-धीरे कार डूबती रही और उस कार के साथ तैराकी नहीं कर पाने वाला युवराज भी डूब गया, उसकी मृत्यु हो गई, और उस गड्ढे के बाहर वर्दी पहने हुए पच्चीसों जवान और अन्य लोग, जो राहगीर थे, तमाशबीन बनकर देखते रहे. एक डिलीवरी बॉय ने हिम्मत कर पानी में उतरने की कोशिश की, पर घना कोहरा होने की वजह से वह युवराज तक पहुंच नहीं पाया.
जब इस पूरी घटना पर व्यवस्था पर प्रश्न खड़े हो रहे थे और टैक्सपेयर्स के पैसों पर पल रही सरकारी एजेंसियों के लोगों की क्षमता पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे थे, उसी बीच यह वीडियो क्लिप वायरल की गई, जिसमें युवराज अपने कुछ दोस्तों के साथ एक पब में दिखाई दे रहे हैं.
वीडियो क्लिप में सीसीटीवी फुटेज है, जो यह दर्शाता है कि पब में युवराज की उपस्थिति दुर्घटना से पहले की थी. ऐसा लगता है कि कोई पुलिस या किसी सुरक्षा एजेंसी का जवान अपने किसी अधिकारी के कहने पर सीसीटीवी फुटेज को अपने मोबाइल फोन पर रिकॉर्ड कर रहा था और तभी उस अधिकारी के फोन आने पर उसने अपने वरिष्ठ अधिकारी को “जय हिंद सर” कहा होगा. और इसलिए वीडियो क्लिप में जय हिन्द सर की आवाज सुनाई पड़ती है.
“जय हिंद सर” पुलिस और कुछ अन्य वर्दीधारी तथा लोगों की सुरक्षा में लगे विभागों में किसी जवान द्वारा अपने से वरिष्ठ को सम्बोधन में फ़ोन रिसीव करते हुए कहा जाता है. पर अभी चूंकि यह पता नहीं चल पाया है कि वीडियो किसने बनवाया और वायरल किया, अतः बिना किसी ठोस साक्ष्य के शत-प्रतिशत यह नहीं कहा जा सकता कि सीसीटीवी फुटेज किसी पुलिस अधिकारी ने ही कलेक्ट करवाई थी और संभवतः उसी ने उसे सोशल मीडिया पर वायरल भी करवाया. पर संदेह तो यही है फुटेज कोई पुलिस का जवान उस बार से कलेक्ट कर रहा है.
सीसीटीवी फुटेज बार से लेकर उसे सोशल मीडिया पर वायरल कराने के इस मामले में पुलिस का कोई अधिकारी हो या कोई और, पर यह कोशिश हद दर्जे की निर्लज्जता और अपराध है कि इतनी बड़ी दुर्घटना में सरकार और प्रशासन पर सवाल उठाने की बजाय मृतक को ही दोषी ठहराने का प्रयास किया जाए.
सत्य यह भी है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में युवराज के पेट में शराब की मात्रा नहीं पाई गई, जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है.
अगर यह मान भी लिया जाए कि युवराज दुर्घटना के पहले पब या बार में गए थे, तो क्या इससे वे गंभीर सवाल खत्म हो जाते हैं जो सरकारी व्यवस्था की नाकामी से जुड़े हैं. क्या इससे वह सवाल खत्म हो जाते हैं कि उस जगह 90 डिग्री पर मुड़ने वाले रोड की डिजाइन किसने की और उसे अप्रूव किसने किया.
जब गड्ढे में काफी पानी भरा हुआ था, तो बिल्डर्स जो मॉल बना रहे थे, उन्हें उचित चेतावनी देकर उस गड्ढे से पानी क्यों नहीं निकलवाया गया और उस गड्ढे के चारों तरफ मजबूत दीवार क्यों नहीं खड़ी की गई? साथ ही वहां ड्राइवर्स के लिए चेतावनी साइनबोर्ड, रिफ्लेक्टर और लाइट क्यों नहीं था? साइट पर लापरवाही से काम करने की वजह से बिल्डर्स पर भारी जुर्माना क्यों नहीं किया गया? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक दबाव था या प्रशासनिक?
उसी जगह पर कुछ दिनों पूर्व एक ट्रक भी दुर्घटनाग्रस्त हुआ था. ऐसे में उन अधिकारियों की नींद क्यों नहीं खुली, जिनसे यह आशा थी कि वे उसके बाद आने वाले समय में ऐसी दुर्घटना न हो, इसके लिए त्वरित कदम उठाएंगे? क्या कुछ अधिकारियों का ट्रांसफर और निलंबन इस घटना के लिए पर्याप्त सजा है? यह मामला सदोष मानव वध का क्यों नहीं है?
जो जवान और अधिकारी वहां समय रहते पहुंच गए, पर उन्होंने कोई ऐसा उचित प्रयास नहीं किया, जिससे युवराज की जान बच सके, क्या उन्हें अपनी सेवा में बने रहने का अधिकार है? और अब क्या इस बात को जांच के दायरे में नहीं लेना चाहिए कि कौन सा वह व्यक्ति या अधिकारी है, या व्यक्तियों और अधिकारियों का वह समूह है, जिनकी यह निर्लज्ज कोशिश है कि सरकार और प्रशासन के ऊपर उठते गंभीर सवालों से बचने के लिए युवराज को ही उसकी मौत का दोषी ठहरा दिया जाए?
पर इस बात की आशा करना व्यर्थ है कि प्रशासनिक मशीनरी द्वारा अपनी खाल बचाने और कुछ लोगों द्वारा युवराज को ही उसकी मौत के लिए दोषी ठहराने के निर्लज्ज कोशिशों के बीच इस घटना से जुड़े गंभीर सवालों के जवाब मिल पाएंगे.

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