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आपकी बात-  परिणामों पर एसआईआर का धब्बा, पर ममता बनर्जी का बेतुका हठ रंजन श्रीवास्तव

आपकी बात-
परिणामों पर एसआईआर का धब्बा, पर ममता बनर्जी का बेतुका हठ
रंजन श्रीवास्तव
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देश की आजादी के 78 वर्ष तथा 8 महीने के बाद तथा अपने वर्तमान अस्तित्व के 46 वर्ष तथा 28 दिन के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में सफलता के विशेष मायने हैं. कारण: भारतीय जनसंघ के संस्थापक तथा भाजपा के पितृपुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म बंगाल प्रेसिडेंसी (बाद में पश्चिम बंगाल) के कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था. डॉ. मुखर्जी भवानीपुर क्षेत्र में ही बस गए थे, जहां से वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बार अपना स्वयं का चुनाव हार गईं.
आजादी के बाद पश्चिम बंगाल में कभी भी हिंदू महासभा या भारतीय जनसंघ या अपनी स्थापना के बाद भाजपा कभी भी अपनी सरकार नहीं बना पाई. आजादी के बाद 30 वर्षों तक कांग्रेस, बाद में लगभग 34 वर्षों तक वाम मोर्चे की सरकार तथा वर्ष 2011 के बाद लगातार 3 कार्यकाल ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की सरकार रही. भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या का मामला हमेशा से उठाती रही. 9 जून, 2020 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि राजनीतिक हिंसा में 100 से ज्यादा भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या वर्ष 2014 के बाद की गई, हालांकि तृणमूल कांग्रेस सरकार तथा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे सिर्फ प्रोपेगेंडा बताती रहीं.
बिहार विधानसभा चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के लिए इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने अपने भाषण में कहा कि “गंगाजी बिहार से बंगाल तक बहती है. बिहार की जीत ने पश्चिम बंगाल में विजय का रास्ता खोल दिया है.” और अब पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रचंड बहुमत की जीत को कमल का कमाल बताते हुए प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि, “गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक कमल ही कमल खिला हुआ है.”
पर इस जीत को विपक्ष विशेषकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस मानने को तैयार नहीं है. विपक्ष ही नहीं बल्कि सिविल सोसायटी के कई ऐसे प्रबुद्ध सदस्य जो देश में लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं, वे भी इस जीत को मानने को तैयार नहीं हैं. कम से कम दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त तथा एक पूर्व चुनाव आयुक्त भी चुनाव आयोग के कई निर्णयों से असहमत हैं.
ममता बनर्जी ने तो यहां तक कहा कि 100 से ज्यादा सीट भाजपा ने लूट ली, चुनाव आयोग तथा केंद्रीय पैरामिलिट्री फोर्स की मदद से. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य कई विपक्ष के नेताओं ने इस चुनाव को वोट चोरी का एक और उदाहरण बताया.
इस विवाद के केंद्रबिंदु में हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा उनके द्वारा वोटर लिस्ट की शुद्धिकरण के लिए शुरू किया गया स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR). और SIR पर भी इतना ज्यादा विवाद नहीं होता, अगर लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के नाम पर तथा अन्य कारणों से लगभग 27 लाख लोगों को चुनाव में उनके मताधिकार से वंचित नहीं किया जाता.
विपक्ष का यह भी आरोप है कि दोनों चरणों के मतदान के ठीक पहले लगभग 6-7 लाख नए वोटर्स के नाम जोड़ दिए गए, जबकि वोटर्स लिस्ट के ड्राफ्ट का प्रकाशन पहले ही हो चुका था.
विपक्ष का कहना है कि कुल मिलाकर लगभग 90 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए, पर सबसे ज्यादा विवाद का केंद्र 27 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित किया जाना है. उनका कहना है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब लाखों की संख्या में वोटर्स को उनके मताधिकार से वंचित किया जाए.
ममता बनर्जी की ताकत लगभग 28 प्रतिशत वोटर्स थे जो मुस्लिम हैं. विपक्ष का आरोप है कि इस ताकत पर SIR के माध्यम से प्रहार किया गया. इसके अतिरिक्त चुनाव आयोग द्वारा भाजपा नेताओं को सांप्रदायिक नारे लगाने की खुली छूट दी गई, जिससे पूरे राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ तथा अन्य तरीकों जैसे 2.5 लाख केंद्रीय सशस्त्र बलों के जवानों की मौजूदगी, तृणमूल कांग्रेस के वर्कर्स को काउंटिंग सेंटर्स में जाने से रोकना इत्यादि से मदद की गई.
पर जहां तक चुनाव परिणामों की बात है, यह भी नहीं कहा जा सकता कि ममता बनर्जी के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर नहीं था.
पश्चिम बंगाल के कुछ पत्रकारों के अनुसार सीमावर्ती इलाकों में अल्पसंख्यक समुदाय की संख्या में असामान्य बदलाव देखने को मिल रहा था, पर ममता बनर्जी इस पर चुप थीं. यही कारण था कि भाजपा के घुसपैठिया मुद्दा ने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया.
आरजी कर मेडिकल कॉलेज की छात्रा के साथ रेप और उसकी हत्या के मामले में ममता बनर्जी सरकार ने जिस संवेदनहीनता का परिचय दिया था, उसकी भाजपा ही नहीं बल्कि कई विपक्षी दलों ने भी निंदा की थी. भ्रष्टाचार का एक ऐसा रैकेट खड़ा हो गया था जिससे जनता असहज महसूस कर रही थी.
ऐसे में ममता बनर्जी का यह हठ कि वह अपने पद से त्यागपत्र नहीं देंगी, उनकी छवि को और नुकसान ही पहुंचाएगा.
भाजपा कार्यकर्ताओं को जीत की बधाई देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अच्छी बात कही कि, “आज जब भाजपा जीती है तो… बदला नहीं, बदलाव की बात होनी चाहिए, भय नहीं, भविष्य की बात होनी चाहिए.”
देखना यह है कि यह साफ़ सुथरा संदेश वाकई पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार के कार्यों में दिखेगा या नई सरकार आने वाले समय में बदले की ही राजनीति करती पाई जाएगी

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