सेंधवा में हरि-हर मिलन: शिव-विष्णु संगम की झांकी से जगमगाया शहर का आकाश, ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच हरि-हर मिलन का ऐतिहासिक आयोजन, भक्तिभाव से सराबोर हुआ सेंधवा
किला परिसर से निकली भगवान राजराजेश्वर की पालकी सवारी, पुष्पवर्षा और जयकारों के बीच संपन्न हुआ हरि-हर मिलन
सेंधवा में पहली बार आयोजित हरि-हर मिलन में भक्तों की अभूतपूर्व भीड़ उमड़ी। किला परिसर से भगवान शिव की पालकी सवारी निकाली गई, जो शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए सत्यनारायण मंदिर पहुंची। ढोल-नगाड़ों, जयकारों और आतिशबाजी के बीच पूरा शहर भक्तिमय वातावरण में डूब गया।
सेंधवा में हरि-हर मिलन का भव्य आयोजन
सेंधवा में मंगलवार को पहली बार हरि-हर मिलन का आयोजन हुआ। किला परिसर स्थित प्राचीन राजराजेश्वर मंदिर से शाम 6:30 बजे भगवान शिव की पालकी सवारी निकाली गई। सवारी के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और पूरे मार्ग में ढोल-नगाड़ों की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो गया। पालकी यात्रा किला गेट, राम बाजार और श्याम बाजार से होते हुए मोतीबाग चौक स्थित सत्यनारायण मंदिर पहुंची। इस दौरान भक्तों ने जयकारों के साथ भगवान राजराजेश्वर का स्वागत किया और जगह-जगह पुष्पवर्षा तथा आतिशबाजी से शहर का माहौल अलौकिक बन गया।
शिव-विष्णु संगम की परंपरा का जीवंत रूप
यह आयोजन सकल हिंदू समाज और हिंदू समाज सेवा समिति द्वारा कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी की रात को किया गया, जिसे वैकुंठ चतुर्दशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस तिथि पर भगवान शिव और भगवान विष्णु का मिलन होता है। इसी परंपरा के तहत भगवान राजराजेश्वर (शिव) पालकी में सवार होकर सत्ता सौंपने के लिए भगवान विष्णु (सत्यनारायण) के दरबार पहुंचे। रात 8 बजे भगवान राजराजेश्वर की बिल्व पत्र की माला भगवान विष्णु को और भगवान विष्णु की तुलसी माला भगवान राजराजेश्वर को अर्पित की गई। इसके साथ ही हरि-हर मिलन विधिवत संपन्न हुआ और आरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया।

सेंधवा की नई धार्मिक परंपरा बनेगा आयोजन
पूरे आयोजन में महिलाओं, पुरुषों और बच्चों का उत्साह चरम पर रहा। भक्त पारंपरिक वेशभूषा में झांकी के दर्शन के लिए उमड़े। शहरवासियों ने अपने घरों और दुकानों पर दीप जलाकर भगवान का स्वागत किया। सत्यनारायण मंदिर परिसर में समिति पदाधिकारियों ने आतिशबाजी कर श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि आने वाले वर्षों में हरि-हर मिलन को सेंधवा की नई धार्मिक परंपरा के रूप में स्थापित किया जाएगा। शहर के विभिन्न मंदिरों और सामाजिक संगठनों ने भी इस आयोजन में सक्रिय रूप से सहभागिता निभाई।



