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आपकी बात, दिल्ली के मलबे में सपने, सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम रंजन श्रीवास्तव

ranjansrivastava1@gmail.com
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उत्तर प्रदेश के औरैया के पवन के सामने सपनों का असीमित संसार था और उसके सपनों से जुड़ी थीं उसके माता-पिता और चार बहनों की जाने कितनी उम्मीदें.
पवन का एडमिशन कुछ महीने पूर्व ही, 20 जुलाई को दिल्ली यूनिवर्सिटी में बीएससी कंप्यूटर साइंस कोर्स के लिए हुआ था. जाहिर है, पवन के माता-पिता, उसकी चार बहनों और स्वयं पवन के लिए यह दिन उनके सपनों को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था.

बहुत सारे बच्चों की तरह पवन ने भी सत्य निकेतन के एक पीजी (PG) हॉस्टल को अपने रहने के लिए ठिकाना चुना, क्योंकि यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में इतने कमरे नहीं हैं कि सभी बच्चों की जरूरतों को एक साथ पूरा किया जा सके.
पवन पिछले महीने रक्षाबंधन त्योहार पर अपने घर औरैया आया था. यह रक्षाबंधन उसके लिए खास था, क्योंकि दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन के बाद यह पहला रक्षाबंधन था, जिसे वह अपने घर पर बहनों के साथ मना रहा था.
5 सितंबर को पवन वापस दिल्ली लौटा, इस बात से अनजान कि अगले 24 घंटों के अंदर ही वह पीजी हॉस्टल, जहां रहकर उसे अपने करियर को एक आकार देना था, भरभराकर नीचे गिर जाएगा और उसके मलबे में दबकर उसकी मृत्यु हो जाएगी.
जिन अन्य चार छात्रों की मृत्यु हुई, उनमें से दो मध्य प्रदेश से थे, एक छत्तीसगढ़ से और एक अन्य उत्तर प्रदेश से था.
सभी के अपने-अपने सपने थे. देवास, मध्य प्रदेश का 18 वर्षीय अर्पित जॉर्ज चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना चाहता था. मध्य प्रदेश के कटनी के अक्षत का सपना आईएएस (IAS) अधिकारी बनने का था.
अर्पित की ही तरह छत्तीसगढ़ के युवराज का लक्ष्य चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना था. इसी तरह, उत्तर प्रदेश का 20 वर्षीय अभिषेक कॉमर्स और फाइनेंस के क्षेत्र में अपने करियर को लेकर आगे बढ़ना चाहता था.
ज्यादा दिन नहीं हुए जब जंतर-मंतर पर छात्रों और युवाओं ने शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर परीक्षाओं में पेपर लीक को लेकर बड़ा आंदोलन किया और उनके आंदोलन के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा तक देना पड़ा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इंस्टाग्राम पर अपना वीडियो पोस्ट करके युवाओं को संदेश दिया.
युवाओं और छात्रों के लिए उनकी आउटरीच (outreach) की कोशिशों से ऐसा लगा कि अब देश भर में सरकारों का ध्यान शिक्षा व्यवस्था और उसकी खामियों पर होगा.
पर सत्य निकेतन के पीजी हॉस्टल की घटना बताती है कि हो सकता है पेपर लीक पर सरकार का कुछ ध्यान गया हो, पर अभी भी शिक्षा व्यवस्था की बहुत सी खामियों को लेकर सरकारें बेपरवाह हैं.
बताया जाता है कि सत्य निकेतन इलाके में ही वहां के स्थानीय भाजपा विधायक के भी कई हॉस्टल चलते हैं.
जहां छात्रों की भीड़ हो और उनसे निजी हॉस्टलों के जरिये अच्छी-खासी कमाई की उम्मीद हो, तो सत्ताधारी नेता क्यों पीछे रहें और फिर सरकार अवैध हॉस्टलों के खिलाफ कार्रवाई भी क्यों करे.
क्या फर्क पड़ता है अगर हॉस्टलों के मालिकों के लालच और दिल्ली नगर निगम के अधिकारियों की लापरवाही या भ्रष्टाचार के कारण किसी परिवार के पवन, अर्पित, युवराज और अभिषेक अवैध इमारतों के मलबे में दबकर अपना जीवन गंवा दें.
राजनीति चलती रहेगी. चुनावों में खोखले नारे लगते रहेंगे. चुनाव जीतने के लिए लोगों को उनकी और दूसरों की जाति और संप्रदाय की याद दिलाई जाती रहेगी. उपलब्धियों के बड़े-बड़े विज्ञापन सड़कों पर और मीडिया में आते रहेंगे.
ऐसी दुर्घटनाओं में शोक-संवेदना की रस्म अदायगी होती रहेगी. कुछ लोग गिरफ्तार होंगे. कुछ त्वरित अन्य कार्रवाई भी की जाएगी. धूल जमी फाइलों में से पुरानी गाइडलाइंस निकालकर उन्हें नया करके फिर से पेश किया जाएगा, जैसे अब सब कुछ बदलकर रख दिया जाएगा.
पर शाम होते-होते सभी नेता और अधिकारी टैक्सपेयर्स के पैसों से खरीदी गई लग्जरी गाड़ियों में बैठकर टैक्सपेयर्स के पैसों से बने सरकारी शीशमहलों में अपने आपको कैद कर लेंगे, इस आशा और विश्वास के साथ कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है और अगले चुनाव तक जनता जब वोट देने आएगी तो जाति और धर्म के नाम पर ही वोट देगी.
किसी को आश्चर्य नहीं होता जब ऐसी खबर आती है कि पिछले 10 वर्षों में केंद्रीय मंत्रियों के सरकारी बंगलों के रख-रखाव पर लगभग 550 करोड़ रुपये खर्च किए गए, या एक ट्रिब्यूनल द्वारा एक धनपति के 22,000 करोड़ रुपये की बैंकों को लेनदारी को 6.5 करोड़ रुपये कर दिया गया.
सरकार की उपलब्धियों के बखान और प्रधानमंत्री तथा विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्रियों की इमेज को चमकाने के लिए हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दिए जाएंगे.
पर अगर नहीं होगा तो यह कि देश की राजधानी तक में बच्चों को अपना भविष्य संवारने के लिए सरकार या यूनिवर्सिटीज द्वारा बुनियादी सुविधाओं के साथ हॉस्टल उपलब्ध कराया जाए.

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