श्रम संहिताएँ: कागज़ी सुधार बनाम जमीनी सच्चाई का बढ़ता अंतर
आर्थिक विकास के दावों के बीच रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक गरिमा पर उठते सवाल

श्रम संहिताएँ कागज़ों पर एक बड़े सुधार के रूप में प्रस्तुत की गई हैं। नीतिगत स्तर पर इन्हें ऐतिहासिक कदम बताया गया और डिजिटल माध्यमों व सोशल मीडिया पर इनका व्यापक प्रचार हुआ। इन प्रस्तुतियों से ऐसा प्रतीत होता है मानो श्रमिकों की कार्य-स्थितियों और सामाजिक सुरक्षा में व्यापक बदलाव आ चुका हो।
इसी बीच अर्थव्यवस्था की तस्वीर भी चमकदार दिखाई जाती है। Economic Survey में देश की अर्थव्यवस्था तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ती दिखती है—शहर विस्तार कर रहे हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं और रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग तस्वीर पेश करती है। मजदूर के हिस्से में आज भी अस्थायी काम, सीमित सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी ही आती है। विकास की इस दौड़ में काम जरूर बढ़ा है, पर मजदूर की स्थिरता और गरिमा अब भी पीछे छूट रही है।
इस विरोधाभास को समझने के लिए Azim Premji University की ‘State of Working India’ (SWI) रिपोर्ट्स एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती हैं, जिन्हें देश में रोजगार की स्थिति का सबसे भरोसेमंद आकलन माना जाता है।
SWI 2018 ने पहली बार स्पष्ट रूप से बताया कि भारत में GDP वृद्धि के बावजूद रोजगार उसी गति से नहीं बढ़ रहा—यानी ‘जॉबलेस ग्रोथ’ की समस्या गहराती जा रही है।
SWI 2019 ने इस संकट को और स्पष्ट करते हुए बताया कि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर सबसे अधिक है—डिग्री होने के बावजूद रोजगार नहीं।
SWI 2021 ने कोविड-19 के असर को दर्ज करते हुए दिखाया कि कैसे महामारी ने गरीबी बढ़ाई, महिलाओं को श्रम शक्ति से बाहर धकेला और अनौपचारिक क्षेत्र को गंभीर नुकसान पहुँचाया।
SWI 2023 ने यह रेखांकित किया कि जाति, जेंडर और सामाजिक पहचान आज भी रोजगार और आय को प्रभावित करते हैं—हालांकि कुछ सुधार हुए हैं, लेकिन असमानता अब भी बनी हुई है।
और नवीनतम SWI 2026 रिपोर्ट यह बताती है कि देश का युवा कार्यबल तेजी से बढ़ रहा है और शिक्षित भी हो रहा है, लेकिन उसे उसकी योग्यता के अनुरूप सम्मानजनक और स्थायी रोजगार नहीं मिल पा रहा है।
इन सभी रिपोर्ट्स का साझा निष्कर्ष एक ही दिशा में इशारा करता है—आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के बीच गहरा असंतुलन।
प्रचार के दौरान यह भी बताया गया कि नई श्रम व्यवस्था लागू होते ही मजदूरी बेहतर होगी, काम के घंटे संतुलित होंगे और सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी। लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है।
रोजंदारी (डेली वेज) पर काम करने वाले मजदूरों के लिए यह बदलाव आज भी उतना स्पष्ट नहीं है। नियमित काम, तय मजदूरी और समय पर भुगतान जैसी बुनियादी समस्याएँ अब भी बनी हुई हैं। कई स्थानों पर समान कार्य के लिए अलग-अलग मजदूरी दी जा रही है और ओवरटाइम का भुगतान भी नियमों के अनुरूप नहीं होता।
नोएडा से लेकर पीथमपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों तक, श्रमिक आज भी वेतन, सुरक्षा और स्थायी रोजगार के सवालों से जूझ रहे हैं। बढ़ती महंगाई ने उनकी स्थिति को और कठिन बना दिया है।
ठेका प्रथा का विस्तार इस स्थिति को और जटिल बनाता है। इस व्यवस्था में श्रमिक सीधे नियोक्ता से नहीं जुड़े होते, जिससे जवाबदेही तय करना कठिन हो जाता है और कानून का लाभ कई बार उन तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाता।
प्रवासी श्रमिकों की स्थिति इस संदर्भ में और भी चिंताजनक है। अस्थायी रोजगार, सीमित आय और बुनियादी सुविधाओं की कमी उनकी प्रमुख समस्याएँ हैं। PF और ESIC जैसी योजनाएँ होने के बावजूद उनका लाभ सभी तक प्रभावी रूप से नहीं पहुँच पाता।
स्पष्ट है कि नीतियों के वादों, आर्थिक विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अब भी एक बड़ी दूरी बनी हुई है।
इसलिए अब ज़रूरत केवल विकास दर बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसे विकास की है जो रोजगार पैदा करे—वह भी सम्मानजनक और स्थायी। इसके लिए श्रम-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देना, न्यूनतम वेतन का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना, ठेका प्रथा में जवाबदेही तय करना और सामाजिक सुरक्षा को सार्वभौमिक बनाना आवश्यक है।
तभी यह कहा जा सकेगा कि श्रम सुधार और आर्थिक विकास केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने देश के श्रमिकों के जीवन में वास्तविक और ठोस बदलाव लाया है।



