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राज्यसभा सांसद डॉ सुमेर सिंह सोलंकी ने आउटसोर्स और संविदा नियुक्तियों में आरक्षण लागू करने की मांग राज्यसभा में उठाई

राज्यसभा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने आज राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान सरकारी विभागों में आउटसोर्स और संविदा के माध्यम से हो रही नियुक्तियों में आरक्षण व्यवस्था लागू करने का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने सदन का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि वर्तमान में देश और राज्यों के विभिन्न सरकारी विभागों में बड़ी संख्या में नियुक्तियाँ आउटसोर्सिंग और संविदा के आधार पर की जा रही हैं, लेकिन इन भर्तियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं की जा रही है, जो सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत है।

डॉ. सोलंकी ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15(4) और 16(4) सामाजिक न्याय और समान अवसर की गारंटी देते हैं, लेकिन आउटसोर्स और संविदा नियुक्तियों में इन प्रावधानों की भावना को दरकिनार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह है कि सफाई कर्मी, डेटा एंट्री ऑपरेटर, सुरक्षा गार्ड, तकनीकी सहायक जैसे पदों से लेकर क्लर्क और इंजीनियर तक की नियुक्तियाँ भी ठेके या आउटसोर्सिंग के माध्यम से की जा रही हैं, जहाँ न तो आरक्षण की व्यवस्था है और न ही रोजगार की स्थिरता या सामाजिक सुरक्षा।

उन्होंने सदन को अवगत कराया कि इसका सीधा प्रभाव अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के युवाओं पर पड़ रहा है। इन वर्गों के युवाओं को न तो स्थायी रोजगार मिल पा रहा है और न ही उन्हें आरक्षण का लाभ मिल रहा है, जिससे उनमें निराशा और असंतोष बढ़ रहा है।

डॉ. सोलंकी ने बताया कि एक अनुमान के अनुसार देश में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और विभिन्न संस्थाओं में लगभग 10 से 15 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में संविदा, ठेका या आउटसोर्स व्यवस्था के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि केवल मध्यप्रदेश में ही लगभग दस लाख लोग इस व्यवस्था में काम कर रहे हैं।

राज्यसभा सांसद ने यह भी कहा कि संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई कर्मचारी 10 से 15 वर्षों तक कार्य करने के बावजूद स्थायी नहीं हो पाते, ठेकेदार बदलते ही कर्मचारियों को हटा दिया जाता है, कई स्थानों पर सरकार द्वारा स्वीकृत वेतन से भी कम भुगतान किया जाता है और कई कर्मचारियों को महीनों तक वेतन नहीं मिल पाता। इसके साथ ही उनसे लंबे समय तक कार्य लिया जाता है, लेकिन न तो ओवरटाइम का भुगतान मिलता है और न ही पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा।

डॉ. सोलंकी ने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की रिपोर्टों में भी इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है कि आउटसोर्स और संविदा नियुक्तियों में आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं हो रही है।

उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि आउटसोर्स और संविदा के माध्यम से की जाने वाली सभी भर्तियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण अनिवार्य रूप से लागू किया जाए। साथ ही वर्तमान में चल रही ऐसी सभी भर्तियों की समीक्षा की जाए और इस विषय पर एक उच्चस्तरीय संसदीय समिति का गठन किया जाए।

डॉ. सोलंकी ने कहा कि यदि देश को वास्तव में सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के मार्ग पर आगे बढ़ाना है तो इस विषय पर गंभीरता से विचार कर ठोस और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि समाज के वंचित वर्गों के युवाओं को भी समान अवसर और सुरक्षित भविष्य मिल सके।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सरकार इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ विचार करेगी और सामाजिक न्याय की भावना को सशक्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी।

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