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भोपाल में राष्ट्रीय सम्मेलन में उठे मजदूरों की सेहत और पर्यावरणीय संकट के गंभीर मुद्दे, व्यावसायिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और मजदूर अधिकारों पर मंथन, बनी कार्ययोजना

विश्व पर्यावरण दिवस पर गांधी भवन में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में 12 राज्यों के प्रतिनिधियों ने स्वास्थ्य, पर्यावरण और श्रमिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की।

जनोदय पंच। विश्व पर्यावरण दिवस पर भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में व्यावसायिक स्वास्थ्य, पर्यावरणीय नुकसान, जलवायु परिवर्तन और मजदूरों के अधिकारों पर चर्चा हुई। विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने श्रमिक सुरक्षा, स्वास्थ्य चुनौतियों और भविष्य की कार्ययोजना पर विचार साझा किए तथा कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।

भोपाल स्थित गांधी भवन में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (जेएसआई) द्वारा व्यावसायिक और पर्यावरणीय स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, जम्मू और कश्मीर, दिल्ली, बिहार, छत्तीसगढ़, मणिपुर, असम, ओड़ीशा, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के मजदूर संगठनों, जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों, समुदाय प्रतिनिधियों तथा पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। कार्यक्रम में व्यावसायिक स्वास्थ्य, पर्यावरणीय स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन तथा पानी एवं वैश्विक गर्मी जैसे विषयों पर चार सत्र आयोजित किए गए। प्रतिभागियों ने कहा कि उद्योग, खनन, निर्माण, घरेलू कार्य और अन्य असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत लाखों मजदूर आज भी स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी जोखिमों का सामना कर रहे हैं। सिलिकोसिस प्रभावित मजदूरों ने भी अपने अनुभव साझा किए। अमूल्य निधि ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और कार्यस्थल से जुड़े स्वास्थ्य खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।

  

सिलिकोसिस, एस्बेस्टस और पर्यावरणीय संकट पर विशेषज्ञों ने रखे विचार

व्यावसायिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ जगदीश पटेल ने कहा कि कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य संबंधी जोखिम व्यापक हैं और उनकी पहचान आवश्यक है। उन्होंने बताया कि 90 से अधिक प्रकार के कार्यों में सिलिकोसिस का खतरा रहता है। वहीं 70 से अधिक देशों में एस्बेस्टस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, जबकि भारत में केवल इसकी खनन गतिविधियों पर रोक है। सुश्री चुन्नी ने कहा कि मजदूरों को कार्यस्थल पर अनेक प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है, जिनमें गंभीर दुर्घटनाएं भी शामिल हैं। सम्मेलन के दूसरे प्रमुख सत्र में खनन, पर्यावरणीय क्षति, सुरक्षित पेयजल और जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य पर प्रभावों पर चर्चा हुई। कैलाश मीणा ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता बताई, जबकि राजकुमार ने नदियों के समाप्त होने और वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों पर चिंता व्यक्त की। राकेश दीवान ने पारंपरिक ज्ञान और जंगल संरक्षण के महत्व पर जोर दिया।

भविष्य की रणनीति तय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार कोर्स की घोषणा

सम्मेलन के अंतिम सत्र में व्यावसायिक स्वास्थ्य से संबंधित भविष्य की रणनीतियों और राज्य स्तर पर गतिविधियों को मजबूत करने पर चर्चा की गई। निर्णय लिया गया कि 10 दिसंबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस पर जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करेगा। घोषणा पत्र जारी करते हुए व्यावसायिक स्वास्थ्य स्थितियों, घातक उद्योगों में कार्यरत मजदूरों के लिए बने कानूनों एवं सुरक्षा व्यवस्थाओं के मूल्यांकन संबंधी रिपोर्ट तैयार करने की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। पांच राज्यों में विकास परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों का स्वास्थ्य सर्वे तथा स्वास्थ्य सेवाओं एवं ईएसआई की स्थिति का सर्वे भी किया जाएगा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार कोर्स शुरू करने का निर्णय लिया गया, जिसका पहला कार्यक्रम 1 से 7 सितंबर 2026 तक श्रीनगर में आयोजित होगा।

कार्यक्रम में मोहन सुलिया, कृष्णार्जुन बर्वे और दिनेश रायसिंग ने मजदूरों की समस्याओं को सामने रखा। आयोजन को सफल बनाने में संजीव सिन्हा, गोरांग महापात्रा, चंद्रकांत यादव, पुनिता कुमार, प्रकाश गार्डिया, इफत राग, रही रियाज, हेमलता कंसोटिया, मुकुट लोचन और ऋषिकान्त की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

 

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