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मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल; हाईकोर्ट ने राज्य व केंद्र सरकार से मांगा जवाब, 17 अगस्त तक नोटिस जारी

सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बी.एल. जैन द्वारा प्रस्तुत जनहित याचिका की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट नेराज्य एवं केंद्र सरकार को सूचना पत्र जारी कर 17 अगस्त 2026 तक जवाब तलब किया है।

सेंधवा। म.प्र. में 16 जून से नवीन शैक्षणिक सत्र प्रारम्भ हो चुका है, लेकिन विद्यार्थियों को अभी भी मूलभूत एवं बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर म.प्र. उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में दायर जनहित याचिका की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर एवं न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने राज्य एवं केंद्र सरकार को सूचना पत्र जारी कर 17 अगस्त 2026 तक जवाब तलब किया है।

जनहित याचिका में उठे गंभीर मुद्दे

सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बी.एल. जैन द्वारा प्रस्तुत जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिषेक तुगनावत ने न्यायालय को बताया कि वर्तमान में प्रदेश में लगभग 40 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 एवं शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्य की है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रही है।


CAG रिपोर्ट में उजागर हुई हकीकत

न्यायालय को यह भी बताया गया कि देश की आजादी के 79 वर्षों बाद भी प्रदेश की शैक्षणिक व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। कैग की वर्ष 2025 की रिपोर्ट, जो फरवरी 2026 में विधानसभा में प्रस्तुत हुई, के अनुसार प्रदेश में 2 लाख 89 हजार स्वीकृत पदों में से 1 लाख 15 हजार 678 पद रिक्त हैं। वहीं 83 हजार 514 स्कूलों में से 5 हजार स्कूल भवन जर्जर हैं, 3 हजार 400 स्कूलों में शौचालय नहीं हैं और 10 हजार स्कूलों में बिजली सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।

हजारों स्कूलों में नहीं हैं जरूरी संसाधन

रिपोर्ट के अनुसार 1895 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक नहीं है, 40 हजार स्कूलों में बाउंड्रीवाल नहीं है और हजारों स्कूलों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। कई स्कूल झोपड़ियों में संचालित हो रहे हैं। डिजिटल इंडिया की बात करने वाले प्रदेश में 59 हजार स्कूलों में कंप्यूटर सुविधा भी नहीं है।

छात्रों की संख्या में भारी गिरावट

याचिकाकर्ता ने न्यायालय को बताया कि पिछले 10 वर्षों में 1 से 12वीं तक के शासकीय स्कूलों में 22 लाख 3 हजार विद्यार्थियों की कमी दर्ज की गई है, जबकि इसी अवधि में जनसंख्या में वृद्धि हुई है। इसे शिक्षा व्यवस्था में गंभीर गिरावट का संकेत बताया गया है। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के जनवरी 2026 के निर्देशों का भी उल्लेख किया गया, जिसमें सभी स्कूलों में सेनेटरी पैड और पृथक शौचालय अनिवार्य किए गए हैं।


सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल

याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य सरकार बजट का लगभग 16 प्रतिशत यानी भारी राशि मुफ्त योजनाओं पर खर्च कर रही है, जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए पर्याप्त बजट नहीं दिखता। वहीं कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार के कारण मरम्मत व निर्माण कार्यों में शासकीय निधि का दुरुपयोग हो रहा है।

सरकार से 17 अगस्त तक जवाब तलब

सुनवाई के बाद न्यायालय ने केंद्र एवं राज्य सरकार को 17 अगस्त 2026 तक जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश जारी किए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से प्रदेश के नौनिहालों के उज्ज्वल भविष्य और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के पालन की मांग न्यायालय के समक्ष रखी गई है।

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