राजबाड़ा 2 रेसीडेंसी; विप्लव जी, यह मध्य प्रदेश है,यहां के नेताओं से पार पाना बहुत मुश्किल काम है।

राजबाड़ा 2 रेसीडेंसी
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विप्लव जी
यह मध्य प्रदेश है,यहां के नेताओं से पार पाना बहुत मुश्किल काम है।
भाजपा और संघ के अच्छे-अच्छे तपस्वियों
की साधना भंग हुई है मध्य प्रदेश में
भाजपा के नए प्रदेश प्रभारी विप्लव देव की मध्य प्रदेश यात्रा के बाद तरह-तरह की चर्चा है। कहां जा रहा है कि विप्लव का मिजाज पिछले प्रभारी महेंद्र सिंह की तुलना में कुछ अलग है और वह अपने दांव पेच में माहिर मध्य प्रदेश के नेताओं को ज्यादा झेलने की स्थिति में नहीं है। भोपाल से रवाना होते वक्त पार्टी के जिम्मेदार लोगों को यह हिदायत दे गए हैं कि 3 महीने में सब ठीक कर लीजिए उसके बाद का समय मेरा है।
प्रदेश की गुटबाजी, बड़े नेताओं की आपसी खींचतान,सत्ता और संगठन के बीच चल रहा द्वंद और भाजपा के आम कार्यकर्ता की मायूसी को विप्लव देव ने अच्छे से समझ लिया। वह यह भी समझ गए होंगे कि मध्य प्रदेश में किस तरह मुख्यमंत्री और कुछ मंत्री आमने-सामने हैं। कोर ग्रुप की बैठक में जो कुछ उन्होंने सुना वह उनके कान के जाले झाड़ने और मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन की स्थिति जानने के लिए पर्याप्त है।
विप्लव जी,जितनी आपकी उम्र है उतनी या उससे ज्यादा मध्य प्रदेश के कई नेताओं की राजनीतिक उम्र हो गई है। पिछले 30 साल का एक पत्रकार के रूप में मेरा अनुभव कहता है कि घाट घाट का पानी पी चुके मध्य प्रदेश के नेता अपने मन की करते हैं। सबने दिल्ली में और संघ में अपने-अपने गॉडफादर चुन रखे हैं। उनकी स्थिति यह है कि यह सब को घोलकर पी जाने का माद्दा रखते हैं। पार्टी के कई प्रभारी आए अपना रुतबा शुरू में दिखाए लेकिन कुछ महीने बाद वह सब मध्य प्रदेश के इन नेताओं के आगे नतमस्तक हो गए या यूं कहें की दुम दबाकर आगे पीछे घूमने लगे।
इन्हें किसी की परवाह नहीं है इन नेताओं का आर्थिक तंत्र इतना मजबूत हो गया है कि इन्हें सब कुछ मेनेजेबल लगता है। यह लोग छोटे-मोटे मैनेजर नहीं है इनकी मैनेजमेंट कैपेसिटी का अंदाज आप इसी बात से लगा सकते हैं की पार्टी के एक बड़े नेता,जो सत्ता और संगठन में अहम भूमिका में थे,के परिवार में कुछ साल पहले जब शादी हुई तो मध्य प्रदेश के मंत्री ने उस हाई प्रोफाइल शादी को मैनेज किया था। किसी बड़े नेता को कैसे मैनेज किया जाता है यह इन्हें बखूबी आता है।मैनेज करने का मेरा आशय आप समझ गए होंगे।
इनकी ताकत का अंदाज आप इसी बात से लगा सकते हैं कि संघ के वे तमाम दिग्गजों जो संघ से भाजपा में भेजे जाने के बाद मध्य प्रदेश में संगठन महामंत्री या संभागीय संगठन मंत्री की भूमिका में आए थे उनमें से ज्यादातर इनके आगे शरणम गच्छामि हो गए। संघ के इन तपोनिष्ठ प्रचारकों को भी मध्य प्रदेश के भाजपा नेताओं ने दुनिया दिखा दी। यह प्रचारक इनके रंग में ऐसे रंगे की आम कार्यकर्ता को भी भूल गए और पार्टी में वजनदार लोग जैसा चाहते थे उनकी हां में हां मिलाते रहे।
संघ में रहते हुए इन प्रचारकों की निष्ठा और ईमानदारी के जो चर्चे हम सुना करते थे भाजपा में आने के बाद इससे इतर हमको सब कुछ सुनने को मिला। पार्टी के आम कार्यकर्ता का झन प्रचारकों से मोह भंग हो गया। संभागीय संगठन मंत्री की जो व्यवस्था पार्टी ने की थी उसके दुष्परिणाम का अंदाज तो आप इसी बात से लगा सकते हैं कि बाद में पार्टी को ही यह व्यवस्था खत्म करना पड़ी। इनमें से कई अब सक्रिय राजनीति में आकर जो जौहर दिखा रहे हैं वह आपको जल्दी ही मालूम पढ़ने लगेंगे।
आपकी पहली यात्रा के बाद पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने अपने समर्थकों के बीच ठहाके लगाते हुए कहा कई प्रभारी आए और चले गए यह तो बच्चा है थोड़े दिनों में सब समझ जाएगा। आप युवा हैं पार्टी को आपसे बहुत अपेक्षा है। मध्य प्रदेश में इस दौर में आपकी भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है कि 2 साल बाद विधानसभा चुनाव होना है। अभी मैदान में जो स्थिति है उसमें पार्टी की राह बहुत मुश्किल भरी है। कुशाभाऊ ठाकरे का मध्य प्रदेश जो एक समय में देश में भाजपा के लिए पायलट की भूमिका में होता था बहुत बुरा वक्त देख रहा है।
सत्ता और संगठन दोनों में हालत खराब है सरकार में जिम्मेदार पदों पर लोग बैठे लोगों के भ्रष्टाचार के किस्से आम हो गए हैं। लोगों के काम इसलिए नहीं हो रहे हैं कि क्योंकि वे रिश्वत के रूप में मांगा जा रहा मनमाना पैसा नहीं दे पा रहे हैं। सरकार इवेंट की तरह चल रही है।ब्यूरोक्रेट्स, पॉलीटिशियंस पर हावी है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल का आपके सामने यह कहना है कि अफसर हमारी सुनते ही नहीं। वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का यह कहना भी मायने रखता है कि 15 15 दिन तक मुख्यमंत्री से बात ही नहीं हो पाती है। मुख्यमंत्री सुबह से लेकर रात तक मैदान और दफ्तर में सक्रिय रहते हैं लेकिन इसका नतीजा कहीं दिख नहीं रहा।
संगठन में बहुत कसावट की जरूरत है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की सहजता और सरलता का संगठन में ही जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग बेजा फायदा उठा रहे हैं। इन लोगों ने आप यह अफवाह फैलाना शुरू कर दी है कि खंडेलवाल तो अध्यक्ष रहना ही नहीं चाहते। वे तो इस्तीफा देने की तैयारी में है।दतिया उप चुनाव के बाद मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच भी अबोलापन सा है। संगठन में पद मिलते ही नेता कार्यकर्ता को भूलने लगता है और उसके निगाहें सीधे इनोवा और फॉर्च्यूनर गाड़ियां तलाशने लगती है।
पार्टी का छोटा कार्यकर्ता संगठन से इसलिए दूर होता जा रहा है कि आप उसे रोज एक नया काम बता देते हैं। पार्टी दफ्तर से जैसे ही बुलावा जाता है उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती है।उसकी पीड़ा यह है कि कम उससे लिया जाता है लेकिन इसका प्रतिफल बड़े लोगों के खाते में दर्ज हो जाता है। मध्य प्रदेश में सरकार से जुड़े हजारों राजनीतिक पद अभी भी खाली पड़े हैं। इंदौर जैसे शहर में तो 52 महीने बीत जाने के बाद भी नगर निगम में एल्डरमैन तक नियुक्त नहीं हो पाए हैं। इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद का फैसला इसलिए नहीं हो पा रहा है की मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री दोनों की इस मामले में अलग-अलग राय है।


