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सेंधवा में काव्य गोष्ठी में कवियों ने रिश्तों, समाज और जीवन की विसंगतियों पर किया प्रहार, हास्य-व्यंग्य और संवेदनाओं से सजी साहित्यिक शाम

सेंधवा काव्यमंच की गोष्ठी में रचनाकारों ने सुनाईं विविध रचनाएं, बेटी के सम्मान, सामाजिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाओं को मिला स्वर

जनोदय पंच। सेंधवा पब्लिक स्कूल में आयोजित साहित्यिक काव्य गोष्ठी में कवियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों, रिश्तों, मानवीय संवेदनाओं और जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्त किया। कविता, गीत, हास्य और व्यंग्य की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को भावविभोर किया और सामाजिक सरोकारों पर सोचने का अवसर दिया।

सेंधवा काव्यमंच के तत्वावधान में शनिवार को निवाली रोड स्थित सेंधवा पब्लिक स्कूल में साहित्यिक काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर और सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। नगर के साहित्यकारों और कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज, रिश्तों, जीवन के अनुभवों और बदलते दौर की परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

गोष्ठी की शुरुआत विशाल त्रिवेदी ने अपनी रचना ‘तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी पीठ खुजाऊं’ से की। उन्होंने समाज में बढ़ते स्वार्थ और सच से दूरी बनाने की प्रवृत्ति पर कटाक्ष किया। सतीश सोनवणे ने ‘खुद से सवाल होना चाहिए, अंदर बवाल होना चाहिए’ के माध्यम से आत्ममंथन और जागरूकता का संदेश दिया।

रिश्तों और सामाजिक विसंगतियों पर कविताओं से प्रहार:

डॉ. महेश बाविस्कर ने बदलते दौर की विसंगतियों को रेखांकित करते हुए कहा, ‘बदलते दौर में हर दिन नया तमाशा है, जिंदगी जिंदगी नहीं, अब जुए का पासा है।’ उन्होंने रिश्तों में अदब और बड़प्पन बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनकी पंक्तियां ‘रिश्ते चाहे सुलगते रहें, भरम जिंदा रहे’ ने संबंधों की जटिलताओं को अभिव्यक्त किया।

विनय मंडलोई ने ‘मन मिले तो जग मिले, वरना न मिले भाई-भाई; मन मिले तो तू और मैं एक-दूजे की परछाई’ के माध्यम से आपसी प्रेम, सद्भाव और मन के मेल का महत्व बताया। श्रीमती मंजुला शर्मा ने अपनी निमाड़ी रचना ‘म्हारो गांव कठईं खोवाई गयो, कोई कऽ पाव तो बतावजो’ के जरिए गांव की संस्कृति, परंपराओं और पुरानी यादों का मार्मिक चित्रण किया।

नीलेश मंगल ने बेटी के सम्मान पर केंद्रित रचना ‘अगर हर नजर में बेटी देवी जैसी होती, तो हर सुबह भी नवरात्रि जैसी होती’ सुनाकर बेटियों के प्रति सम्मान का संदेश दिया। श्रीमती अनिता चतुर्वेदी ने कहा, ‘दरार कैसी भी हो, एक को दो भागों में बांट देती है, चाहे दरार मन पर पड़ी हो या जमीन पर।’ उन्होंने ‘एक क्षण न जाने कितनी व्यथा दे गया, जो भी मिला व्यथा की कथा कह गया’ पंक्तियों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को स्वर दिया।

हास्य, व्यंग्य और गीतों ने बांधा समां:

चेतन गोयल ने समर्पण और सेवा भावना पर आधारित रचना प्रस्तुत करते हुए कहा, ‘मांगने वालों से देने वाला बनो, समर्पण ये भाव हमें यज्ञ सिखाता है।’ शाकिर शैख ‘शाकिर’ ने ‘मरने वालों की करते हैं सभी तारीफ, जिंदा हैं यहां बेकार नजर आते हैं’ पंक्तियों के माध्यम से समाज की विडंबना पर कटाक्ष किया। दीपक भार्गव ने अपने गीत ‘कैसे कटेगी जिंदगी तेरे बगैर, मेरे बगैर’ की प्रस्तुति से श्रोताओं को भावुक किया।

पवन शर्मा ‘हमदर्द’ ने कुंवारों की व्यथा को हास्य के रंग में पिरोते हुए सुनाया, ‘कुंवारों की यही दास्तां है कि किसी से दिल नहीं मिला, तो किसी से कुंडली नहीं मिली।’ उनकी प्रस्तुति ने गोष्ठी में हास्य और मनोरंजन का रंग भर दिया।

प्रो. शुभम वर्मा ने ‘हर बार रह जाती है कसक कुछ न कुछ, तेरा अच्छा होना भर काफी नहीं था, उसे चाहिए था और कुछ न कुछ’ के माध्यम से अपेक्षाओं और अधूरी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। वाजिद हुसैन ‘साहिल’ ने अपनी गजल के जरिए जीवन के अनुभवों और उपेक्षा की पीड़ा को स्वर दिया।

सेवानिवृत्ति, जन्मदिन और ऐतिहासिक योगदान का उल्लेख:

कमलेश देसाई ने सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में काव्यमंच परिवार ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। डॉ. के.आर. शर्मा ने अग्रसेन जयंती के संदर्भ में वैश्य समुदाय के देशभक्ति से जुड़े ऐतिहासिक योगदान की जानकारी उपस्थितजनों को दी। वहीं प्रो. जी.सी. खले ने अपनी विशिष्ट व्यंग्य शैली से रचनाकारों का उत्साहवर्धन किया और उनकी प्रस्तुतियों की सराहना की।

गोष्ठी में कविता, गीत, व्यंग्य, हास्य और सामाजिक सरोकारों का समन्वय देखने को मिला। रचनाकारों ने अपनी अभिव्यक्तियों के माध्यम से साहित्य की सामाजिक भूमिका को रेखांकित किया। कार्यक्रम का संचालन सेंधवा काव्यमंच के संयोजक मनोज मराठे ने किया। गोष्ठी की जानकारी डॉ. विकास पंडित ने दी।

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