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बड़वानी के कपास को वैश्विक पहचान दिलाने की पहल,अंजड़ में ‘कस्तूरी कॉटन’ पर एक दिवसीय कार्यशाला एवं उन्मुखीकरण कार्यक्रम आयोजित

किसानों को मिली गुणवत्तायुक्त कपास उत्पादन एवं फसल कटाई उपरांत पद्धतियों में सुधार के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी,  बेहतर बीज, HDPS तकनीक और ब्रांडिंग से किसानों की आय बढ़ाने की नई राह

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बड़वानी; जिले में कपास की गुणवत्ता में सुधार कर गुणवत्तायुक्त कपास उत्पादन प्रोत्साहन एवं बड़वानी के कपास को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में विशिष्ट पहचान दिलाने की दिशा में मंगलवार कृषि उपज मंडी प्रांगण अंजड़ में कस्तूरी कॉटन भारत,भारतीय कपास निगम एवं ज़िला प्रशासन व कृषि विभाग बड़वानी द्वारा कस्तूरी कपास पर आधारित एक दिवसीय कार्यशाला एवं उन्मुखीकरण का कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

इस कार्यक्रम में श्री नितिन तोमर प्रोजेक्ट कोर्डिनेटर CITI-CDRA (कॉटन डवलपमेंट एंड रिसर्च एसोसिएशन), श्री उदयसिंह खरात संयुक्त निदेशक (TEXPROCIL), श्रीपद जोशी, अहमदाबाद मुख्य अधिवक्ता के रूप में उपस्थित हुए.
श्रीपद जोशी ने किसानो को कपास बीज की गुणवत्ता खरीदी मे सावधानी उन्नत किस्मो की पहचान विषय पर जानकारी दी

कार्यशाला में CITI-CDRA (कॉटन डेवलपमेंट एंड रिसर्च एसोसिएशन) के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर श्री नितिन तोमर ने किसानों को उत्तम कृषि पद्धतियों, उत्पादन वृद्धि, कृषि में संदूषण नियंत्रण एवं HDPS पद्धति विषयों पर जानकारी प्रदान की।​इस दौरान उन्होंने बताया कि उत्तम खेती हेतु बीजों का चयन बहुत आवश्यक है। किसान भाई सही बीजों और किस्मों का चयन करें; पैकेट पर फोटो देखकर या कम कीमत के बीज का चयन न करें। अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त बीज चुनें एवं अधिकृत डीलर से ही बीज क्रय करें।​उन्होंने कपास में प्राकृतिक फसल सुरक्षा प्रबंधन, HDPS तकनीक अपनाने, नियमित रूप से मिट्टी परीक्षण कराने एवं गोबर की खाद का उपयोग करने हेतु किसानों को प्रेरित किया। इस दौरान उन्होंने फसल में विभिन्न पोषक तत्वों की कमी से होने वाले रोगों के संबंध में भी विस्तृत जानकारी दी तथा उन्हें पहचानकर इसके अनुरूप पोषक तत्व डालने के लिए किसानों का मार्गदर्शन किया।

श्री उदयसिंह खरात, संयुक्त निदेशक (TEXPROCIL) ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए बताया कि जिस प्रकार हिरन की नाभि में कस्तूरी होती है, लेकिन वह उसकी खुशबू को बाहर तलाशता रहता है, उसी प्रकार हमारे किसान भाई भी कपास की गुणवत्ता एवं पोस्ट-हार्वेस्ट (फसल कटाई उपरांत) पद्धतियों में सुधार कर अपनी आय में कई गुना वृद्धि कर सकते हैं।
कार्यशाला के दौरान एक कृषक ने उत्सुकतापूर्वक प्रश्न किया कि क्या वह यहाँ उपस्थित किसानों को ‘कस्तूरी कपास’ का खेत दिखा सकते हैं? इस पर कार्यक्रम में आए विषय-विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह कपास की कोई नई किस्म नहीं है, बल्कि भारत सरकार द्वारा भारतीय कपास को “कस्तूरी कॉटन भारत” नाम दिया गया है यह एक विशिष्ट ब्रांड नाम है, जो तय मानकों को पूरा करता है। चूंकि इससे पूर्व भारत में उत्पादित कपास का कोई वैश्विक आधिकारिक ब्रांड नाम नहीं था, जबकि अन्य प्रमुख कपास उत्पादक देशों के पास अपने कपास को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय ब्रांड, प्रमाणन चिह्न या भौगोलिक ट्रेडमार्क मौजूद हैं, इसलिए ‘कस्तूरी कॉटन भारत’ की शुरुआत की गई है।

पृष्ठभूमि और उद्देश्य
वर्ष 2023 में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय, भारतीय कपास निगम (CCI) और द कॉटन टेक्स्टाइल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (TEXPROCIL) के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत ‘कस्तूरी कॉटन’ की ब्रांडिंग, ट्रेसिबिलिटी (उत्पत्ति की ट्रेकिंग) और प्रमाणन का कार्य किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय कपास के लिए गुणवत्ता और पारदार्शिता के मानक स्थापित करना, श्रेष्ठ उत्पादन सुनिश्चित करना तथा किसानों को उनकी उपज का बेहतर बाजार मूल्य दिलाना है।

कस्तूरी कपास के प्रमुख मानक:
* रेशे की लंबाई: 28 मिमी से 31 मिमी तथा प्रीमियम अतिरिक्त लंबे रेशे (ELS) के लिए 34 मिमी से 35 मिमी तक।
* ट्रैश कंटेंट: कचरा या अशुद्धि 2% से कम होनी चाहिए।
* नमी की मात्रा: कपास में नमी का स्तर अधिकतम 8% या उससे कम।
* रेशे की मजबूती: उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों द्वारा परीक्षण किए जाने पर रेशे में उच्च तन्य शक्ति होनी चाहिए।
* यूनिफॉर्मिटी इंडेक्स: रेशों की लंबाई में एकरूपता और समानता का उच्च सूचकांक।
* माइक्रोनेयर वैल्यू: रेशे की महीनता और परिपक्वता का पैमाना।
कार्यक्रम के दौरान किसानों एवं जिनर्स द्वारा अपनाई जाने वाली मानक संचालन प्रक्रिया (SOPs) के बारे में भी विस्तार से बताया गया। जिस प्रकार हर व्यक्ति की अपनी एक विशिष्ट पहचान होती है, उसी प्रकार प्रत्येक बेल पर यूनिक क्यूआर (QR) कोड शामिल किया गया है, जिसमें जिनर का विवरण, फसल वर्ष, बेल का वजन इत्यादि जानकारी दर्ज होती है। यह क्यूआर कोड ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसबिलिटी से जुड़ा हुआ है।
किसानों को कपास की पैकिंग से लेकर भंडारण और परिवहन तक स्वच्छता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया तथा कपास में मिट्टी, कचरा, पत्तियाँ एवं अन्य बाहरी सामग्रियों की मिलावट को पूरी तरह रोकने के संबंध में विशेष रूप से जानकारी दी गई।

इस दौरान कलेक्टर श्रीमती जयति सिंह ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि किसान भाई हमारे अन्नदाता और अभिन्न अंग हैं। जिला प्रशासन द्वारा एचडीपीएस (HDPS) पद्धति, उन्नत बीज, रात्रि चौपाल एवं विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित कर किसानों की आय में वृद्धि और बेहतर उत्पादन हेतु निरंतर कार्य किया जा रहा है। यह कार्यशाला कपास की गुणवत्ता में सुधार के व्यावहारिक उपायों, जीनिंग प्रक्रिया के मानकों, स्वच्छ, टिकाऊ व उच्च गुणवत्ता तथा कपास के महत्व पर पूरी तरह केंद्रित है। ‘कस्तूरी कॉटन भारत’ के अंतर्गत गुणवत्तायुक्त कपास की प्रत्येक बेल पर 500 रुपये का प्रोत्साहन दिए जाने का प्रावधान है। प्रशासन द्वारा स्टार रेटिंग एवं गुणवत्ता परीक्षण के संबंध में निरंतर रूप से प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि किसानों को लगातार जागरूक किया जा सके और उन्हें उनकी मेहनत का उचित व सर्वोपरि मूल्य मिल सके।
इस कार्यक्रम में कृषि विभाग के अधिकारी / कर्मचारी,कॉटन व्यापार संघ के पदाधिकारी, कपास उद्योग से संबंधित व्यापारीगण, भारतीय कपास निगम के पदाधिकारी, भारतीय किसान संघ के पदाधिकारीगण,मंडी के पदाधिकारीकरण,कृषि सखी एवं बड़ी संख्या में स्थानीय किसान उपस्थित रहे।

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